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Random Scribbled Story

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#Blogpost:- 50 What keeps you going when things don’t go your way? Do you too crave for a shoulder to lay your heads on or do you want someone to lend their ears to you so that you can tell all that has been going down in your head for so long? Do you expect a random text from somebody asking you how have been and why are you so quiet these days or asking you is your life treating you fair enough? Like do you want complete isolation, dim light and you just starring at the empty walls of your room trying to figure out what has been going wrong, what needs to be fixed that you aren’t able to recognize, sometimes the answers you are wanting to get from your disturbed life lie in the chaos of your life. Maybe the thing that you’re trying outright isn’t the thing you ever wanted to do. Do you also relate to songs when you hear them and try to associate them with your life? Do you also want to be treated like you have been treating everyone like? Do you also want...

Friendship By Chance

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#Blogpost:- 49 One of those rare friends that he found lately this year and would like to cherish it for a lifetime. All friends although are strangers at the beginning and some go on to become the heart and soul to each other's joys and sorrows while some just stop in the midway with the thought of having a better choice at hand. This friendship turns out to be a little unusual in many ways, as both them had no clue of each other and met just like the earth met the shooting stars , a bit of her broke and a whole of him burnt. Things change and so do situations so one must realise that good and bad is a part of life and the absence of good times makes us realize the importance of good times. The experience that he carried with himself was that he ha d been through lots and lots of friendship failures and he believed that it's okay to fail than to live an unfilullfilled life full of regrets. With each failure he learnt, he understood what friendship is all a...

मैं बनूंगा बाबा की बैसाखी

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#Blog post no:- ४८ कंधे पर वो जब मुझे घुमाया करते बेसब्री से गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार किया करते देख कर मुझे जो खिल खिला कर हंस पड़ते वहीँ तो हैं मेरे बाबा एकलौते ढलती शाम और मेरी बेचैनी उनको देखने की दूर उनकी साइकिल देख कुछ हलचल सी होती मुझमें आते वो सेव बुनिया जो लेकर अपने झोले में बैठकर साथ उनकी हाथों से खाना वो बुनिया भी अमृत लगता रात को नींद न आती तो पंखा डुलाकर हमें सुलाते वो लोरी बहुत अलग थी जो बाबा थे हमे सुनते भोर होते ही साथ नदी पर जाते लौटते बख्त चाचा के दूकान से बर्फ का गोल चूसते आते अब जो बड़ा हो गया हूँ समय से लड़ना जो सीख रहा हूँ करवटें बदल बदल कर रातें हैं कटती बाबा आपकी लोरी है बड़ी याद आती एक रोज़ सब कुछ बदल सा गया जब स्टेशन पर उतर कर हमने उन्हें न पाया पहुंचा घर तो देखा चार पायी पर लेटे थे वो नम थी आँखें फीकी मुस्कान अब भी दे रहे थे वो भागता हुआ पहुंचा जब उनके पास मैं बोल पड़े वो चल नहीं सकता अब मैं आंसुओं को अंदर दबाकर हंस पड़ा मैं कह दिया चल पड़ोगे आप जब बनूँगा आपका बैसाखी मैं अब समय उनके इर्द गिर्द ही हमारे बीतते बीते दिनों की ...

बचपन मैं अपना पीछे कहाँ छोड़ आया

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ब्लॉग पोस्ट :- ४७ बच्चपन मैं अपना कहाँ पीछे छोड़ आया ज़माने से कदम मिलने के चक्कर में बहुत आगे निकल गया बचपन दरवाज़े पर खड़ा पुकार रहा था खुशियों की गठरी लाया हूँ ऐसा बता रहा था मैं स्तब्ध खड़ा बस दूर से उसे नीहार रहा था तू मेरा बचपन था मेरी खुशी की एकलौती चाभी जब बरसात में नाउ की कश्ती में ही थी अपनी मस्ती जब टूटते सिर्फ खिलोने थे और रोते सिर्फ घुटने छिलने पर थे उम्र के साथ बड़े हो जाओ ये सुनते हुए आज बहुत आगे निकल आए अब समझ आया की खुशियाँ तो सिर्फ बच्चपन में थे पाए वो आसमान में हवाई जहाज के पीछे भागना अब पीछे छूट गया है पैसे कमाने की होड़ में न जाने कहाँ मेरा बच्चपन मुझसे रूठ गया है चल अपने उस खिलोने वाले मोहोब्बत को जियें दोस्तों के सामने अपनी मेहेंगी गाड़ी दिखा कर फिर इठलायें ऐ ज़माना बड़ा कर के तूने सिर्फ हमें छुपाना सिखाया है कभी तकिये में अपने आँसु, तो कभी होटों पर लव्ज़ कहता है मुझसे वो कि तेरा अब बगल की आंटी के घर से अमरूद तोड़ना उनका सपना ही रह गया है सच्च कहूँ , सच्च कहूँ तो वक़्त अब उनके पास भी थोड़ा ही रह गया है चल फिर से पानी में भीगते हैं ,भीग कर माँ ...

लिख दूँ क्या कुछ भी मैं ?

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ब्लॉग पोस्ट :-४६ लिख दूं क्या कुछ भी मैं ? जो कभी था नहीं क्या कर दूँ बयाँ उसको भी तुम्हे लगा की मैं गलत हूँ क्या सही होकर भी मान लूं अपनी गलती मैं किरदार तो मैंने भी अपना सलीका से निभाया क्या करूँ अगर किसी को मैं न भाया बदल दूँ क्या मैं खुद को दूसरों के लिए बदल दूंगा खुद को तो क्या दे देंगे वो मुझे? वो जो दोस्त तुम्हारे खुशी के वक़्त साथ होते तुम्हारे क्या अपनी सारी दुखों को बांट पाते हो तुम उनसे कभी आईना देख कर पूछना खुद से फिर समझ आएगा हो तुम आखिर कितने अकेले गलती तो सबसे होती है अनजाने में हमसे भी हुई तो क्या उस गलती को लेकर ज़िन्दगी भर रोते रहें दोस्त होते अगर तुम मेरे तो कब का कर देते माफ़ हमें पर अक्सर दोस्त मतलब के यार ही मिलते मैं हँसता नहीं ज़ायदा पर हमेशा दुखी हूँ ऐसा न समझना ठोकरों के वजह से गिरा हूँ अपनी नज़रों से नहीं दिन वो भी आएगा जब याद तुम भी कर रहे होगे हमें कहीं वक़्त बदलता सबका है बस वक़्त अभी हमारा है नहीं चंद दोस्त आज भी साथ हमारे बैठ जाते हैं निराश न होना ऐसा कहकर हौंसला बढ़ाते हैं अमावस्या के बाद चांद फिर रोशन होता है काले बादल हैं अ...

ज़िन्दगी जी रहे हो या झूझ रहे हो

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#ब्लॉग पोस्ट :- ४५ ज़िन्दगी ने पूछा कैसे हो ? कह दिया उसने भी ठीक हूँ । फिर से दोबारा वही सवाल पूछे गए औऱ कुछ देर तक जवाब भी वही रहे । पांचवी बार उसी सवाल को सुनकर वो रो पड़ा । फिर शुरू किया उसने बताना निराश हूँ, थका हूँ, हारा महसूस करता हूँ कर सकता है क्या इस बारे में कुछ तू ? हंसते हुए ज़िन्दगी ने भी कह दिया, दूसरों के लिए जीने मरने के वादे करते हो खुद के लिए थोड़ा सा साहस भी न बचा पाए उसने निराश होकर जवाब दिया :- सब कुछ किसी गैर पर लूटा कर आ रहा हूँ, जिसे कभी मैंने अपना समझ बैठने की भूल कर दी थी । न जाने कब कैसे और क्यों मैंने अपने को खो दिया , मीठे ज़हर का घोल शहद समझ कर पीता गया । जब नींद से जागा तो तू बहुत दूर निकल गयी थी, रोशनी ढूंढ़ली सी पड़ गयी थी । मैं तुम्हे अकेला छोड़ कहाँ जाऊंगी ? ज़िन्दगी ने उसपर हाथ फेरते हुए कहा । जब तक तुम हार नहीं मानते हार और जीत  तुमसे समान दूरी पर होते हैं । उठो  साहस करो, लड़ो और एक बार खुद के लिए हमें पाकर दिखाओ ।

मॉडर्नाइजेशन या संस्कृति का मर्डर

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ब्लॉग पोस्ट :- ४४ जब देखा मैंने आज छोटे छोटे बच्चों को जीने मारने की कसम खाते तो अंदर से थोड़ा सा सहम सा गया, क्या हमारी संस्कृति धीरे धीरे कभी न वापस लौट कर आने वाली राह की ओर बढ़ रही है ? लोग कहते तो हैं कि हिंदी हैं हम हिंदी हैं हम फिर क्यों उस व्यक्ति को हीन भावना से देखते हैं जो अंग्रेजी की जगह हिंदी में वार्ता करना चाहता है? क्यों हम अंग्रेजी को समय की मांग की नज़र से देखते हैं? क्या हिंदी नहीं है समय की मांग? हर देश की एक राष्ट्र भाषा होती है पर हमारे देश में क्यों अंग्रेजी को इतनी महत्व दी जाती है ? क्या ऐसा तो नहीं कि हम अपने ही देश में गैर बन गए हैं , या फिर ऐसा है कि हम आज भी अंदर से अंग्रेजो के गुलाम ही बने हुए हैं ? हर देश की एक संस्कृति होती है ,और भारत देश की संस्कृति तो सबसे अदभुद और पौराणिक है जिसे बाहर के लोग सीखने और देखने के लिए आते हैं पर अपने ही देश वासियों ने अपनी संस्कृति को पराया कर दिया है । ये जो इतना इतराते हैं आप टूटी फूटी अंग्रेजी ही बोल कर कभी सोंचते हैं पीठ पीछे कितने बड़े मजाक के पात्र बनते हैं आप? उसी अंग्रेजी की जगह अगर हिंदी भाषा का प्रयोग करते ...